लोकनायक जयप्रकाश नारायण

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लोकनायक जयप्रकाश नारायण जिन्हें लोग “जेपी” के नाम से भी याद करते है, का देश की स्वाधीनता आन्दोलन में एक सोशलिस्ट नेता के रूप में प्रमुख योगदान था | लेकिन आज लोग उन्हें ज्यादा याद करते है, आपातकाल में उनके संघर्ष एवं साहस के लिए| सन १९७५ में इंदिरा गाँधी ने जब देश पर एक निरंकुश आपातकाल थोपा तब लोगो में साहस भरने हेतु उन्होंने एक अद्भुत नारा दिया ” डरो मत अभी मै जिन्दा हूँ “, | आज ११ अक्टूबर को उनके जन्मदिन के मौके पर हम उनके द्वारा रचित एक कविता साझा कर रहे है जो उन्होंने आपातकाल के दौरान चंडीगढ़ कारावास में लिखी थी

जीवन विफलताओं से भरा है,
सफलताएँ जब कभी आईं निकट,
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।

तो क्या वह मूर्खता थी ?
नहीं ।

सफलता और विफलता की
परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !

इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?
किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए
कुछ अन्य ही पथ मान्य थे, उद्दिष्ट थे,
पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,
पथ-संघर्ष के, सम्पूर्ण-क्रान्ति के ।

जग जिन्हें कहता विफलता
थीं शोध की वे मंज़िलें ।

मंजिलें वे अनगिनत हैं,
गन्तव्य भी अति दूर है,
रुकना नहीं मुझको कहीं
अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।
निज कामना कुछ है नहीं
सब है समर्पित ईश को ।

तो, विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी,
और यह विफल जीवन
शत–शत धन्य होगा,
यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का
कण्टकाकीर्ण मार्ग
यह कुछ सुगम बन जावे !

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