राष्ट्र ऋषि : नानाजी देशमुख

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चंडिकादास अमृतराव देशमुख उपाख्य “नानाजी देशमुख” का जन्म महाराष्ट्र के एक साधारण परिवार में ११ अक्टूबर १९१६ में हुआ था। परिवार में डाक्टर हेडगेवार जी का आना-जाना था तो नानाजी बचपन से ही संघ के संपर्क में आ गये। १९३४ में, डाक्टर हेडगेवार की उपस्थिति में, उन्होंने संघ के लिए आजीवन काम करने की प्रतिज्ञा की। सन १९५१ में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जन संघ की स्थापना की तो नानाजी उसके संस्थापक सदस्यों में से एक थे। लेकिन राजनीति में जाने से पहले भी एक प्रचारक के रूप में वे समाज की सेवा में लगे रहे। एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो बच्चों को भौतिक ज्ञान देने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति,सभ्यता एवं प्राचीन गौरव से भी परिचित कराने का काम करें,इस उद्देश्य से उन्होंने सन् १९५० में देश के पहले सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना गोरखपुर में की। नानाजी के द्वारा लगाया गया वह पौधा आज एक वटवृक्ष का रूप ले चुका है। आज देशभर में विद्याभारती के द्वारा संचालित 12754 विद्यालयों में लगभग 32 लाख छात्र, छात्राएं मूल्य आधारित एवं संस्कार युक्त शिक्षा गृहण कर रहे हैं।
१९७५ के आपातकाल के दौरान पटना के गांधी मैदान में एक रैली में जब पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो जयप्रकाश नारायण को बचाते हुए उनका हाथ टूट गया पर उन्होंने जेपी पर कोई आंच नहीं आने दी।
इसके अतिरिक्त उन्होंने ६० वर्ष की आयु में राजनीति से संन्यास लेकर एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। राजनीति से संन्यास लेने के बाद भी वो समाज जीवन से दूर नहीं हुये। उन्होंने गांधी के ग्राम स्वराज्य और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन को एक साक्षात स्वरूप दिया। चित्रकूट जहां श्रीराम जी ने अपने वनवास का अधिकांश समय बिताया वही चित्रकूट नानाजी के लिए कमृभूमि बनी जिसके विषय में वो स्वयं कभी- कभी हास्य व्यंग में कहते थे कि “लोग राजा राम की पूजा करते हैं और मैं वनवासी राम की”। उन्होंने दीनदयाल शोध संस्थान (Deendayal research institute) की स्थापना की जो DRI के नाम से प्रचलित हैं। DRI चित्रकूट क्षेत्र के ५०० गांवों को स्वावलंबी बनाने की दिशा में काम कर रहा है। सन् १९९९ में नानाजी को उनकी समाज सेवा के लिए पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने २००५ में स्वयं चित्रकूट जाकर नानाजी द्वारा किए गए कार्यों का अवलोकन किया। २७ फरवरी २०१० को अपने ही द्वारा स्थापित चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में उन्होंने अंतिम सांस ली। मृत्यु के उपरान्त उनका शरीर AIIMS Delhi को शोध कार्य के लिए समर्पित कर दिया गया।

नानाजी देशमुख का जीवन हम सभी के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है जो जीवन भर तो समाज के लिए काम करते ही रहे और मृत्यु के बाद भी अपना शरीर समाज को समर्पित कर गए|

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